पाठ्यक्रम: GS2/ शिक्षा/शासन
संदर्भ
- कई विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षा संस्थानों ने प्रस्तावित विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 के अंतर्गत अनुदान वितरण हेतु एक पृथक प्राधिकरण की स्थापना की मांग की है।
विधेयक की प्रमुख विशेषताएँ
- नियामक निकाय: विधेयक के अंतर्गत विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (आयोग) को उच्च शिक्षा के लिए सर्वोच्च नियामक प्राधिकरण के रूप में स्थापित किया गया है।
- यह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद तथा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद का स्थान लेगा।
- आयोग के अंतर्गत नियामक परिषद, प्रत्यायन परिषद तथा मानक परिषद का गठन किया जाएगा।
- आयोग तकनीकी शिक्षा, अध्यापक शिक्षा (शिक्षक प्रशिक्षण) तथा वास्तुकला शिक्षा का विनियमन करेगा।
- चिकित्सा एवं विधि जैसे अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को इसके अधिकार-क्षेत्र से बाहर रखा गया है।
- आयोग की संरचना: आयोग में एक अध्यक्ष तथा अधिकतम 12 सदस्य होंगे।
- आयोग के सदस्यों में निम्नलिखित शामिल होंगे—
- तीनों परिषदों के अध्यक्ष,
- केंद्र सरकार के उच्च शिक्षा सचिव,
- पाँच प्रतिष्ठित विशेषज्ञ,
- राज्य उच्च शिक्षा संस्थानों से दो प्रतिष्ठित शिक्षाविद।
- आयोग के अध्यक्ष का चयन केंद्र सरकार द्वारा किया जाएगा।
- आयोग के सदस्यों में निम्नलिखित शामिल होंगे—
- परिषदों की संरचना: प्रत्येक परिषद में 14 सदस्य होंगे, जिनका नेतृत्व एक अध्यक्ष करेगा।
- परिषद के सदस्यों में प्रतिष्ठित विशेषज्ञ, केंद्रीय उच्च शिक्षा विभाग का एक नामित सदस्य तथा अन्य दो परिषदों के नामित सदस्य शामिल होंगे।
- परिषदों के कार्य
- नियामक परिषद: उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना हेतु न्यूनतम मानकों का निर्धारण एवं उनका अनुपालन सुनिश्चित करना।
- उच्च शिक्षा संस्थानों को समयबद्ध रूप से स्वायत्तता प्रदान करने की प्रक्रिया को सुगम बनाना।
- हितधारकों द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों के विरुद्ध प्राप्त शिकायतों का निवारण करना।
- मानक परिषद: उच्च शिक्षा कार्यक्रमों के लिए अधिगम परिणामों का निर्धारण करना।
- उच्च शिक्षा संस्थानों हेतु न्यूनतम शैक्षणिक मानक निर्धारित करना।
- प्रत्यायन परिषद: उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए प्रत्यायन की रूपरेखा एवं प्रणाली विकसित करना।
- नियामक परिषद: उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना हेतु न्यूनतम मानकों का निर्धारण एवं उनका अनुपालन सुनिश्चित करना।
- सदस्यों को पद से हटाने का प्रावधान: आयोग अथवा परिषदों के अध्यक्ष, परिषदों के अध्यक्षों अथवा पूर्णकालिक सदस्यों को निम्नलिखित आधारों पर पद से हटाया जा सकता है—
- दिवालियापन,
- नैतिक अधमता से संबंधित अपराध में दोषसिद्धि,
- शारीरिक अथवा मानसिक अक्षमता,
- शक्तियों का दुरुपयोग।
- उपाधियाँ प्रदान करने का अधिकार: उपाधियाँ (डिग्रियाँ) केवल निम्नलिखित संस्थाएँ प्रदान कर सकेंगी—
- केंद्र अथवा राज्य के अधिनियम द्वारा स्थापित अथवा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 के अंतर्गत मानित विश्वविद्यालय।
- केंद्रीय अधिनियम द्वारा विशेष रूप से अधिकृत संस्थान।
- नियामक परिषद द्वारा, केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के साथ अधिकृत अन्य उच्च शिक्षा संस्थान।
विधेयक से संबंधित प्रमुख मुद्दे
- उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता: विधेयक के प्रावधान उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं करते।
- कुछ मामलों में पहले से प्राप्त स्वायत्तता भी सीमित हो सकती है।
- वर्तमान में राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान अपने-अपने विशेष अधिनियमों के अंतर्गत शैक्षणिक एवं अनुसंधान संबंधी स्वायत्तता के साथ संचालित होते हैं।
- प्रस्तावित विधेयक ऐसे संस्थानों को आयोग एवं उसकी परिषदों के अधिकार-क्षेत्र में लाता है।
- वित्तपोषण: अनुदानों का आवंटन एवं वितरण वर्तमान में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का एक प्रमुख कार्य है।
- विधेयक में आयोग अथवा उसकी परिषदों के कार्यों में वित्तपोषण को शामिल नहीं किया गया है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 ने विनियमन, प्रत्यायन, वित्तपोषण एवं मानक निर्धारण—इन चार आयामों वाले एकल नियामक की अनुशंसा की थी।
- प्रस्तावित विधेयक में केवल तीन आयामों का प्रावधान है तथा वित्तपोषण को इसमें सम्मिलित नहीं किया गया है।
- व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के प्रति असंगत दृष्टिकोण: तकनीकी, प्रबंधन एवं अध्यापक शिक्षा को वीबीएसए आयोग के अधीन लाया जाएगा।
- वास्तुकला शिक्षा का विनियमन आयोग करेगा, जबकि वास्तुकला परिषद एक व्यावसायिक निकाय के रूप में कार्य करती रहेगी।
- चिकित्सा, विधि तथा कुछ अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रम आयोग के अधिकार-क्षेत्र से बाहर रहेंगे।
- अपील की व्यवस्था: परिषदों के निर्णयों के विरुद्ध अपील केंद्र सरकार के समक्ष की जाएगी।
- यह व्यवस्था भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) तथा भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) जैसे अन्य नियामकों की अपील प्रणाली से भिन्न है।
- अंशकालिक सदस्यों को हटाने के आधारों का अभाव: विधेयक में अंशकालिक सदस्यों को पद से हटाने के आधारों का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है।
महत्त्व
- यह विधेयक राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के दृष्टिकोण को लागू करने का एक नवीन प्रयास है, जिसमें तकनीकी एवं अध्यापक शिक्षा को भी नए नियामक ढाँचे के अंतर्गत सम्मिलित किया गया है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में उच्च शिक्षा प्रशासन के व्यापक पुनर्गठन के अंतर्गत एकल नियामक व्यवस्था की अवधारणा पर विशेष बल दिया गया था।
- नीति में विनियामक कार्यों को पृथक-पृथक व्यवस्थित करने की अनुशंसा की गई थी, ताकि कार्यों की पुनरावृत्ति को कम किया जा सके, कार्यकुशलता बढ़ाई जा सके तथा उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जा सके।
स्रोत: TH
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